जिंदगी फिर नहीं मिलेगी दुबारा – On WORLD SUICIDE PREVENTION DAY

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world suicide prevention day

WORLD SUICIDE PREVENTION DAY

हर साल ५ लाख से ज़्यादा लोग आत्महत्या करते है  उनमे से अधिकतर विध्यार्थी होते है। यह एक कड़वा सत्य है। इसके लिए जरुरी है हम तनाव से ज्यादा से ज्यादा बचें और खुद से प्रेम करें। यह तब ही मुमकिन है जब हम शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होंगे।

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और आज कल तो बहुत सारे ऐसे प्रोग्राम्स चल रहे है, जिससे ऐसे मामलो को कम किया जा सके और लोगो को मानसिक तथा शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए प्रेरित किया जा सके। जीवन से छुटकारा पाने के लिए बड़ने वाले क़दमों को इसी प्रकार रोका जा सकता है, जरुरत है तो बस जागरूकता की। क्यों बढ़ रही है दुनियाभर में आत्महत्या की प्रवर्ति? विश्व आत्महत्या निषेद दिवस (world suicide prevention day) पर पेश है जीवन के अंधेरे पक्ष।

परिस्थितियां जो कराती है आत्महत्या

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वरिष्ठ मनोचिकित्सक का कहना है कि आमतौर पर आत्महत्या के पीछे ६ प्रमुख कारण होते है-

  • शीघ्र आक्रोश में दुसरे को क्षति पहुंचाने के लिए।
  • बाल आत्महत्यायें अपनी बात मनवाने के लिए।
  • आत्महत्या करने का दिखावा करने के दौरान।
  • नशे का आदि होने के कारण सोचने समझने की क्षमता ख़त्म होने पर।
  • परेशानियों से मुक्ति मिल जाएगी, ऐसे सोचने पर।
  • डिप्रेशन आने पर।

किलर नंबर २ होगा डिप्रेशन

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मांसिक बीमारियां जितनी तेज़ी से बढ़ रही है, जिस कारण पूरी दुनियां चिंतित है। डिप्रेशन जितनी तेज़ी से युवाओं और वयस्कों में बेहद रहा है जल्द ही ये ग्लोबल बर्डन ऑफ़ डिजीज की सूची में नंबर दो पर होगा। अठाइस साल पहले ये दसवे नंबर पर था। १९९९ में ये चौथे नंबर पर आ गया, मानना है की २०२० तक ये नंबर २ पर आ जाएगा। मनोचिक्त्सिकों की कमी के कारण, भारत में हालत कुछ ज्यादा ही खराब है।

क्या है कारण

डॉक्टरों के अनुसार डीप डिप्रेशन के रोगियों में से करीब १०% आत्महत्या या कभी न कभी उसकी कोशिश करते हैं। अन्य आत्महत्या के मामलों में अस्थ्याई या शीघ्र आवेश के अलावा शिजोफ्रेनिया जिसमे व्यक्ति असामान्य सामाजिक व्यवहार और वास्तविकता को समझने में विफल रहता है। और दूसरी वजह है मेनिया यानी उन्माद, उन्माद के लक्षणों में बढ़ी हुई मनोदशा (या तो उदार या चिड़चिड़ाहट) शामिल है; विचारों की उड़ान और भाषण के दबाव; और ऊर्जा में वृद्धि, नींद की आवश्यकता में कमी, और अति सक्रियता।

सैड मूड नहीं, कुछ और ही है ये

दो, चार, दस दिन की उदासी को डिप्रेशन नहीं कहा जाता। कभी-कभी उदासी, असफलता में कुछ देर की निराशा, अभाव में पीड़ा, अपमान पर अशांति सहज मानवीय प्रवर्ति है। अगर लगातार 15 दिन या उसे भी ज्यादा अधिक समय तक मन दुखी रहे। यानी निराशा का भाव रहे, नींद और भूक अनियमित हो जाए, रुचिकर कार्यों में भी अरुचि हो जाए, भूक सामान्य से ज्यादा या बिलकुल भी न लगे, नींद बहुत आए या बिलकुल न आए, तो यह खतरे की घंटी है। ऐसे में मनोचिक्त्सक के पास जायें या ऐसे व्यक्ति को बिलकुल अकेला न छोड़े।

शामिल है इसमें केमिकल्स का लोचा

ऐसी स्तिथि नूएरोकेमिकल्स का संतुलन बिगड़ने से आती है। ब्रेन कुछ तत्व बहुत सूक्ष्म मात्रा में बनते है और इस्तेमाल होते है। यह कुछ तत्व पुरे जीवन में कुछ मिक्रोग्राम्स ही आवश्यक होते हैं लेकिन उनकी कमी पूरा जीवन बदल देती है। ब्रेन में लिक्विड कोर्टेक्स नमक एक हिस्सा होता है जिसे सेण्टर ऑफ़ इमोशंस कहा जाता है। इसका सर्किट डिस्टर्ब होने से ही ऐसी स्तिथि उत्पन्न होती है। मूल रूप से यह स्तिथी सेरोटोनिन, नोरएपिनेफ्रीन और सेरोटोनिन नमक न्यूरोचेमिकल्स कि कमी के कारण होती है। यह तीनो या तो आवश्यकता से काम बनने लगते है या ज्यादा खपत होने लगते है। इसके लिए डॉक्टर कि मदद लें।

हालात जो देते है कारण

हर तीन दिन में एक शहर में एक व्यक्ति जान देता है। कोई अधिक तंगी से परेशान होकर आत्महत्या का कदम उठा रहा है या कोई असफल होने पर या दिल टूटने पर जान दे रहा है। बेरोज़गारी, व्यापार में घाटा, घर में कलेश और लम्बी बिमारी, अत्यधिक संवेदनशील, सामाजिक अवेहलना, क़र्ज़ का बोझ भी इसके कारण बन रहे है। ज्यादातर घटनाओं में सामने आया है कि परिजनों ने उसके तनावों को गम्भीरता से नहीं लिया। डॉक्टर से सलाह नहीं ली और इलाज़ नहीं करवाया। हर साल 10 लाख लोग करते है आत्महत्या, गुस्से में उठाते है कदम और परिजनों को बिलखने के लिए चोरर जाते है। आत्महत्या की रोक थाम के लिए एक राष्ट्रीय योजना कि जरुरत है।

बच्चों को कैसे बचायें आत्मघाती कदम उठाने से

  • अपने बच्चे पर पूरी नज़र रखें पर इतनी नहीं कि असहजता के कारण वह आपसे और दूर चला जाए। जाने उसे अवसाद तो नहीं है।
  • जल्द ही काउंसलिंग करायें और डिप्रेशन कि दवा अपने मन से बंद न करें।
  • घर का माहौल दोस्ताना बनायें। बेवजह बच्चों को डाटें नहीं।
  • गुमसुम होने पर बात करें। घर में बच्चों के साथ मिलते ही बात करने कि कोशिश करें। उन्हें प्यार और स्नेह दे।
  • किशोर वर्ग में उनके खाने पीने का ख्याल रखें और दोस्त बनकर रहें।
  • बच्चा कोचिंग जा रहा है तो लौटने पर उससे बात करें कि पुरे दिन में क्या किया और दोस्तों के बारे में भी जानकारी रखें।

सुदर्शन क्रिया को अपने जीवन में हर व्यक्ति जोड़ें, जो सभी समस्याओं को हल करता है और आपकी जीवनशैली बदलता है। यह खुशहाल जीवन की कुंजी है।

 

~ स्टैफी ब्रिज़ावार

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