क्या है जलवायु परिवर्तन के मुख्य तत्व और कैसे यह  प्राकृतिक संतुलन को करता प्रभावित

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evidence of climate change

जलवायु परिवर्तन से नष्ट होता प्राकृतिक संतुलन

ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते जलवायु परिवर्तन में बहुत बड़ा प्रभाव पड़ रहा है जिसके कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ता जा रहा है।

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जलवायु परिवर्तन के बिगड़ते हुए प्रकृति के संतुलन की वजह से कई प्रजातियां विलुप्त होती जा रही है। आज पृथ्वी का संतुलन दिन पर दिन बिगड़ता ही जा रहा है। मानव संसाधनों की वजह से ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ता जा रहा है। इसका पूरा प्रभाव प्रजातियों पर पड़ता है, प्रकृति पर पड़ता है। जिससे कि आने वाले भविष्य में कई प्रजातियों के विलुप्तीकरण का यह सबसे बड़ा कारण बन जाएगा। आइए जानते हैं ग्लोबल वार्मिंग के बारे में…..

क्या है ग्लोबल वार्मिंग ?

पृथ्वी के ऊपर एक परत होती है, जो हमें सूरज की सीधी किरणों से बचाती है। लेकिन मानव संसाधनों की वजह से यह परत दिन पर दिन खोखली होती जा रही है। और इसका सीधा प्रभाव हमारी प्रकृति पर पड़ता है।

 

ग्लोबल वॉर्मिंग से बिगड़ता प्राकृतिक संतुलन

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ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्र का स्तर दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है। जिसके कारण अलग-अलग जगहों पर दिए गए अंडों का पानी में डूबने की शंका है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्र के तापमान में भी अनिश्चित प्रभाव पड़ रहा रेत का तापमान भी घट बढ़ रहा है। जिससे कछुओं के नर या मादा कछुए पैदा होने का डर बना हुआ है। इससे इस प्रजाति का विलुप्त होने का डर बन गया है।

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उत्तरी अटलांटिक के सबसे बड़े और शानदार प्राणी व्हेल का मानव से एक इतिहास जुड़ा हुआ है। लेकिन समुद्र के बढ़ते हुए तापमान के कारण व्हेल के आहार पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ रहा है।

चीन के विशाल पांडा का भी भविष्य खतरे में है क्योंकि यह पांडा चीन में दक्षिण पश्चिमी क्षेत्र में बांस के जंगलों में रहते हैं। और इनका मुख्य आहार बांस ही है। लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के चलते प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया जिसके कारण चीन के बांस जंगल विलुप्त हो गए। और अब यह पांडा भी विलुप्त होने जा रहे हैं।

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इसी तरह प्रकृति पर प्रजातियों के विलुप्तीकरण  का सबसे बड़ा कारण ग्लोबल वॉर्मिंग बन रहा है।

 

ग्लोबल वॉर्मिंग से पैदा होती ग्रीनहाउस गैसे..

कुछ गैसे ऐसी होती है जो ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण पृथ्वी पर पैदा होती जा रही हैं। इसकी वजह से प्रकृति पर एक बहुत बड़ा प्रभाव पड़ रहा है। कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड अथवा अन्य यह ऐसी कुछ कैसे हैं जो ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण प्रकृति पर पैदा होती जा रही हैं। इनसे प्रकृति को ही नहीं मानव को भी बहुत नुकसान है क्योंकि यह कई बीमारियों का कारण भी है।

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मानव जलवायु परिवर्तन के लिए कैसे उत्तरदाई है

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लगभग 200 वर्ष पहले औद्योगिक क्रांति आई। जिसके बाद से मशीनों से सभी वस्तुओं का उत्पादन होने लगा और सभी वस्तुओं के उत्पादन के लिए ऊर्जा की आवश्यकता थी। हमें ऊर्जा कोयले या तेल जैसे ईंधनों से प्राप्त होती  थी लेकिन इस वजह से कुछ ऐसी गैसों का निर्माण होने लगा जिससे मानव और साथी साथ प्रकृति को भी नुकसान पहुंचता है।इसी तरह से औद्योगीकरण के कारण मानव ही प्रकृति के नुकसान और जलवायु परिवर्तन के लिए उत्तरदाई है।

 

कैसे हम जलवायु परिवर्तन से प्रकृति का बचाव कर सकते हैं…..

हम औद्योगिकरण को तो कम नहीं कर सकते लेकिन उन वस्तुओं का इस्तेमाल जो हमें औद्योगिकरण से मिलती हैं उसे हम कम कर के कुछ हद तक औद्योगिकरण के इस्तेमाल को कम कर, जलवायु परिवर्तन में बदलाव ला सकते हैं।

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इसके साथ ही उन वस्तुओं का कम इस्तेमाल करें जिससे ग्रीन हाउस जैसी गैसों प्रकृति में पैदा हो रही हैं और प्रकृति को नुकसान फैला रही है। हम कुछ इस तरह से बचाव कर सकते हैं

  • कपड़े का थैला इस्तेमाल करके।
  • कम दूरी के लिए व्यक्तिगत वाहनों का प्रयोग।
  • पेड़ लगाकर।
  • रोशनी के लिए सीएफएल बल्ब का प्रयोग करना।
  • जब भी और जहां भी संभव हो बिजली का कम से कम प्रयोग करना।

 

 

                                                अंजली चौहान

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