ज़िन्दगी एक क्रिकेट का मैदान

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ज़िन्दगी एक क्रिकेट का मैदान

क्‍या खोया – क्‍या पाया

ज़िन्दगी एक क्रिकेट का मैदान है । जीवन नामक खेल के पिच पर मैं अर्धशतक लगाने के करीब हूँ, बहुत करीब न भी हो, तो भी इसे करीब ही कहा जाएगा । अर्धशतक पूरा करके मैं पिच पर डटी रहूँ एवं आगे भी इसी तरह बैटिंग करती रहूँ, ऐसा, इस दुनिया रूपी दर्शक दीर्घा में बैठे मेरे इष्‍ट जन, बंधु-बांधव, पारिवारिक सदस्‍य तो अवश्‍य चाहेंगे परन्‍तु बॉलिंग तो उस सर्वशक्‍तिमान विधाता के हाथों में है जो हर तरह के गेंद फेंकने में माहिर है । वह विधाता – Googly, Pace/ Seam Bowling या फिर Slow/ Spin Bowling कराकर कब किसको आउट कर दे, पता ही नहीं चलता। सबसे मज़ेदार बात यह कि उनके द्वारा आउट करने पर किसी तरह की अपील या थर्ड अंपायर की तरफ उम्‍मीद से टकटकी लगाने की भी कोई गुंजाइश नहीं रहती ।

ज़िन्दगी एक क्रिकेट का मैदान

अरे, आप लोग क्रिकेट की दुनिया में कहाँ खो गए, यहाँ तो जीवन रूपी खेल की चर्चा हो रही है । जैसा कि मैंने कहा कि मैं अर्धशतक लगाने के नज़दीक हूँ, परन्‍तु अफसोस, मुझे इससे कहीं अधिक खुशी तब हुआ करती थी जब मैं 10 या फिर 15 या अधिक से अधिक 20 रन बनाकर खेल रही थी । ईश्‍वर की अनुकम्‍पा एवं बड़ो के आशीर्वाद से पिच पर लम्‍बे समय तक टिके रहने के बावजूद कम रनों के लिए अधिक खुशी क्‍यों, ये शायद आप लोगों के लिए जिज्ञासा का विषय हो सकता है ।

मौसम और कविताये

आइए, आप लोगों की उस जिज्ञासा को भी शान्‍त करती हूँ । आज से लगभग 30 – 40 वर्ष पुराना समय याद करती हूँ तो वो मनोरम दृश्‍य, वो प्राकृतिक छटाएँ, वो मेघाच्‍छादित आकाश, ईश्‍वर द्वारा कूची से नभ पर उकेरा गया वो इन्‍द्रधनुष, वो पक्षियों का कोलाहल, उषाकाल में गायों का वह रंभाना, हरे रंग के विभिन्‍न शेड्स से सुसज्‍जित चारों तरफ का पर्यावरण – आँखों के सामने ये तमाम चित्र सहज ही तैर उठते हैं, जो किसी समय कवियों और लेखकों को उनकी रचनाओं का आधार प्रदान किया करते थे । उस प्राकृतिक परिवेश को याद करके मन, क्षण मात्र में, कितनी मधुर स्‍मृतियों के वन में भ्रमण कर आता है, यह लेखनीबद्ध कर पाना मुश्‍किल है । एक सुखद अहसास है यह, एक अनभिव्‍यक्‍त अनुभूति है यह, हृदय को तप्‍त कर देने वाली एक भीनी सी खुशबू है यह ।

हाँ, बिल्‍कुल ठीक समझे आप, मैं अपने बचपन के उन तमाम खूबसूरत पलों को याद कर रही हूँ जहाँ हमारा जीवन, आधुनिक सुख-सुविधाओं से वंचित होने के बावजूद उन असीमित, अनन्‍त मानसिक सुख, शारीरिक स्‍वस्‍थता, पारिवारिक एकता एवं आपसी भाईचारे जैसी सुख-सुविधाओं से लैस था जिसे आज भी अगर हम वापस पा जाएं तो आज की इन कृत्रिम सुख-सुविधाओं को ठोकर मारने से बिल्‍कुल नहीं झिझकेंगे, कम से कम मैं तो बिल्‍कुल नहीं ।

मौसम और उसकी बेरुखी 

ज़िन्दगी एक क्रिकेट का मैदान

आज हम-आप सभी, जब जैसा मौसम हो, यह शिकायत करते अवश्‍य पाए जाते हैं कि गर्मी बहुत है अथवा सर्दी बहुत है । हमेशा अपना दोष दूसरों के माथे मढ़ने का आदी इंसान, अत्‍यधिक गर्मी या सर्दी पड़ने का दोष भी बड़ी सहजता से प्राकृतिक या पर्यावरणीय बदलाव के माथे मढ़ देता है परन्‍तु भूल कर भी यह कभी नहीं कहता कि इस बदलाव का जिम्‍मेदार या कहें कि इस भीषण गर्मी या सर्दी के लिए परोक्ष रूप से वह स्‍वयं जिम्‍मेदार है । पुराने समय में बिना एसी, बिना फ्रीज-कूलर या फिर बिना इन्‍वर्टर के भी कभी किसी से प्रकृति या पर्यावरण के सम्‍बन्‍ध में यह शिकायत सुनने को नहीं मिली जो आधुनिक समय में इन सब तमाम सुख-सुविधाओं से लैस इंसान से सुनने को मिलती है ।

कारण जानना चाहते हैं ? बड़ा सहज है कारण – पहले जहाँ इंसान और प्रकृति में मित्रवत् व्‍यवहार था वही आज वैमनस्‍य में बदल गया है । पहले ग्रीष्‍म काल में प्रकृति स्‍वयं इंसान को पंखा झल मन्‍द पवन से शीतलता प्रदान करती थी, शीत ऋतु में रवि स्‍वयं गुनगुनी धूप द्वारा सर्दी से राहत प्रदान करता था, उसके विपरीत आज, प्रकृति मौका पाते ही अपना रौद्र रूप दिखाने से बिल्‍कुल नहीं चूकती । जैसा रास्‍ता इंसान ने चुना है, प्रकृति ने उसी के अनुसार उसे परिणाम भी दिए हैं ।

30 – 40 वर्ष पहले जिन प्राकृतिक मनोरम दृश्‍यों को हमने अपनी आँखों से देखा एवं हृदय से अनुभव किया है उनकी कल्‍पना मात्र ही आज भी हमारे मानसिक तनाव और एकाकीपन को दूर कर देने के लिए पर्याप्‍त है । एकांत में आँखें बन्‍द कर उन प्राकृतिक छटाओं, ग्रीष्‍म काल की भोर वेला में पक्षियों, खास कर गौरेयों की चहचहाहट के साथ आँखें खुलना, बारिश के बाद शीतल मन्‍द पवन के झोंकों से हृदय का तप्‍त हो जाना, वर्षा काल में उमड़ घुमड़ कर नभ पर छाए बादलों की वो कालिमा, घनघोर वर्षा के बाद मेघों का वक्ष चीर कर विजयी मुद्रा में मुस्‍कुराता वो इन्‍द्रधनुष, वर्षा जल से भरे छोटे-छोटे गड्ढों में कागज की नाव बहाना।

उसे बहते हुए आगे बढ़ते देख मन का हर्षित होना, जगह-जगह से मेंढकों से टर्राने की आवाज़ आना, ग्रीष्‍म काल की संध्‍या में सबका, अपने घरों के सामने पानी का छिड़काव कर रात को सोने की तैयारी में मंजियाँ बिछाकर बिस्‍तर लगाकर रखना, शीत ऋतु की दोपहरी में घरों के सामने बने मैदानों में खेल-कूद कर समय बिताना, दादी-नानी एवं माताओं द्वारा स्‍वयं, ऊन से बुनकर सबके लिए स्‍वेटर तैयार करना, पढ़ाई के साथ ही प्रतिदिन शाम को मित्रों के साथ खेलकूद करके स्‍वयं को शारीरिक रूप से फिट रखना, सावन के महीने में जगह-जगह बड़े वृक्षों की शाखों पर झूले पड़ना एवं बंधु-बांधवों के साथ उन झूलों पर झूलना, हर तीज-त्‍यौहार को सगे-संबंधियों एवं पड़ोसियों के साथ मिलकर मनाना, दीवाली पर विद्युत की झालरों के बजाए हाथों से बने कंदीलों से घरों को आलोकित करना…………………… और न जाने कितनी मधुर स्‍मृतियाँ दे गया है, वो समय ।

कहाँ गया वह परिवेश

आह ! न जाने कहाँ गया वो बचपन, वो प्राकृतिक परिवेश, वो आपसी भाईचारा । इन सब से वंचित हैं आज के बच्‍चे, बड़े, बुजुर्ग सभी । इसके लिए हम स्‍वयं जिम्‍मेदार हैं । अपनी आवश्‍यकताओं को पूरा करने की लालसा में हम धीरे-धीरे मूक प्रकृति का लगातार दोहन कर रहे हैं – चाहे वह पेड़ पौधों के काटने के रूप में हो, जल स्रोतों/ भण्‍डारों को नष्‍ट / प्रदूषित करने के रूप में हो अथवा पर्वतों / पठारों को नष्‍ट कर उन पर भवनों/ कारखानों के निर्माण के रूप में हो । शब्‍दों के पलटवार से तो नहीं परन्‍तु पर्यावरण प्रदूषण, हानिकारक व प्रदूषित खान-पान, बाढ़- भूकम्‍प जैसी प्राकृतिक आपदाओं, महामारी, भूस्‍खलन आदि के रूप में यह मूक प्रकृति, अपने साथ हुए हर अन्‍याय का बराबर बदला ले रही है ।

हम, जो आज आधुनिक युग में रहकर, महज धन सम्‍पत्‍ति के अर्जन से स्‍वयं को सम्‍पन्‍नता के तराजू पर तौल रहे हैं, यह नहीं समझना चाह रहे हैं कि असली सम्‍पन्‍नता निरोगी काया में है, आपसी सौहार्द्र में है, प्राकृतिक परिवेश में जीने एवं प्राकृतिक सौन्‍दर्य के अनुभव में है । पैसों से खरीदे गए एयर कण्‍डीशनर की हवा में वह ठण्‍डक कभी नहीं हो सकती जो पीपल, नीम या अन्‍य किसी भी वृक्ष की छांव तले बैठकर मिल सकती है । रसायन के प्रयोग से उगाई गई एवं फ्रीज में रखी सब्‍ज़ियों में वह स्‍वाद कभी नहीं मिल सकता जो रसायन एवं प्रदूषण मुक्‍त प्राकृतिक परिवेश में उगाई गई सब्‍ज़ियों में पाया जा सकता है ।

ज़िन्दगी एक क्रिकेट का मैदान

ज़िन्दगी एक क्रिकेट का मैदान

वीडियो चैटिंग के ज़रिए पारिवारिक सदस्‍यों एवं रिश्‍तेदारों के साथ रोज़ हो रही मुलाकात एवं बातचीत, रिश्‍तों में अपनेपन का वह अहसास कभी नहीं दे सकती जो, वर्ष में सिर्फ एक बार ग्रीष्‍मावकाश के दौरान परिवार के समस्‍त लोगों के साथ दादा-दादी या नाना-नानी के घर एकजुट होने पर दिया करती थी । विदेशों में रहकर पढ़ना एवं वहीं नौकरी करना आज स्‍टेटस सिम्‍बल एवं स्‍वयं को हाई-फाई दिखाने का एक तरीका अवश्‍य हो सकता है परन्‍तु जिस माटी / जिस देश में पले-बढ़े हैं, जिसका अन्‍न खाकर एवं जहाँ से ज्ञान प्राप्‍त  करके हम लायक बने हैं, उसी देश की मजबूती, उसी देश के विकास में सहयोग देने के लिए अपनी सेवाएँ प्रदान करने से अधिक गौरवपूर्ण क्षण शायद और कुछ नहीं हो सकता ।

आप और हम सब, प्रकृति को अपना दुश्‍मन नहीं – मित्र बनाकर, शिक्षा / ज्ञान का किसी के अहित के लिए नहीं – भलाई / विकास की दिशा में प्रयोग करके, वैमनस्‍य का नहीं – आपसी भाईचारे का परिचय देकर, अपने सामाजिक उत्‍तरदायित्‍वों को नज़रअंदाज़ न कर – समझदारी पूर्वक उनका निवर्हन करके, सदैव अपने लिए समस्‍त सुविधाएँ प्राप्‍त करने की उम्‍मीद छोड़ – सर्वजन हिताय की मानसिकता अपनाकर, कौन क्‍या नहीं कर रहा – उसके बारे में टिप्‍पणी करना छोड़कर , प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति स्‍वयं को – ‘’सिर्फ स्‍वयं को’’ हर स्‍तर पर सुधार ले, शायद देश में खुद-ब-खुद सुधार नज़र आएगा ।

श्रावणी गांगुली

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