पुण्यतिथि विशेष: महज 18 वर्ष की उम्र में फांसी के फंदे पर लटक देश के लिए कुर्बान हो गए..

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कैसे खुदीराम बोस को हुई फांसी

महज 18 वर्ष की उम्र में फांसी के फंदे पर लटक देश के लिए कुर्बान हो गए..

 

 

  • कैसे खुदीराम बोस को हुई फांसी?
  • फांसी पर लटकने के लिए खरीदी थी नई धोती।
  • महज 18 की उम्र में खुदीराम बोस फांसी के फंदे पर हंसते-हंसते झूल गए थे।
  • खुदीराम बोस की शहादत ने, देश के नौजवानों में पैदा की क्रांति की लहर।
  • बंगाल में प्रचलित थी खुदीराम बोस की नाम की प्रिंटेड धोती, जिसे लोग बड़े गर्व से पहनते थे।
  • आज ही के दिन 11 अगस्त को, खुदीराम बोस को अंग्रेजों ने फांसी के फंदे पर लटका दिया था और इसके बाद पूरे देश में क्रांति की लहर गर्व के साथ दौड़ पड़ी थी।

 

आइए जानते हैं खुदीराम बोस के जीवन की गाथा…..

कैसे खुदीराम बोस को हुई फांसी

आज के समय में कुछ ही बच्चे ऐसे होंगे जो खुदीराम बोस का नाम जानते होंगे। उनके नाम के पीछे छिपी कहानी जानते होंगे। पर एक समय ऐसा था जब बंगाल में खुदीराम बोस के नाम की प्रिंटेड धोती चलन में थी। और लोग इसे बड़े चाव से और गर्व से पहनते थे। आखिर पहने भी क्यों ना, क्यों ना गर्व महसूस करें आखिर जिस उम्र में बच्चे खेल, पढ़ाई और दोस्ती में रहते हैं उस उम्र में खुदीराम बोस ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। महज 16 साल की उम्र में ही अंग्रेजों में खुदीराम बोस का ऐसा खौफ था, कि उनका नाम सुनते ही अंग्रेज उन का नामोनिशान मिटा देना चाहते थे। पर उन्हें इसके लिए बहुत इंतजार करना पड़ा।

 

छोटी उम्र में ही हो गया था माता पिता का निधन

अमर शहीद खुदीराम बोस का जन्म बंगाल के मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में 3 दिसंबर 1889 को हुआ था छोटी सी उम्र में उनके माता पिता का निधन हो गया था माता पिता के निधन के बाद उन्हें उनकी बड़ी बहन पाला पोसा है वही बंगाल विभाजन के बाद म 16 साल की उम्र में ही खुदीराम बोस स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे उनके जुलूसों में और अंग्रेजो के छक्के छुड़ाने में सबसे आगे रहते थे

 

 

कैसे एक छोटे से बालक से स्वतंत्रता सेनानी बने खुदीराम बोस….

कैसे खुदीराम बोस को हुई फांसी

1905 में ही खुदीराम बोस ने रेवोल्यूशन पार्टी जॉइन कर ली थी। और जगह-जगह अंग्रेजों के खिलाफ पर्चे बांटते रहते थे। 1906 में अंग्रेजों ने उन्हें पर्चे बांटते हुए पकड़ लिया। 1906 मई में अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया था। लेकिन उन्हें उनकी कम उम्र होने के कारण, अंग्रेजों को उन्हें छोड़ना पड़ा। अंग्रेजों की कैद से बाहर निकलने के बाद, खुदीराम बोस के सुर में और तेज आ गया। जिसकी वजह से अंग्रेजों में उनका खौफ पैदा हो गया।

 

कैसे खुदीराम बोस को हुई फांसी??

दिसंबर 1907 में स्वतंत्रता सेनानियों ने बनाई किंग्सफोर्ड को मारने की साजिश। किंग्सफोर्ड बग्गी पर बम फेंक कर उन्होंने एवं स्वतंत्र सेनानियों ने उनकी हत्या कर दी। प्रफुल्ल चंद्र नामक एक स्वतंत्र सेनानी खुदीराम बोस के साथ इस हत्या में शामिल थे। अंग्रेजों ने उन दोनों को चारों तरफ से घेर लिया। प्रफुल्ल चंद्र ने अपने आप को घिरा हुआ देखकर अपने गोली मार ली। लेकिन खुदीराम बोस हत्या के मामले में पकड़े गए। उनके ऊपर मुकदमा चला, और वह दोषी पाए गए। 13 जून 1908 को खुदीराम बोस को फांसी की सजा सुनाई गई। और 11 अगस्त 1908 को खुदीराम बोस को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। उनके अंदर देश प्रेम ऐसा था कि उन्होंने फांसी के लिए नई धोती सिलाई थी, जैसे अपना जन्म दिवस मना रहे हों।

 

इतिहासकारों के मुताबिक खुदीराम बोस फांसी के फंदे पर लटकने वाले सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी थे।

कैसे खुदीराम बोस को हुई फांसी

 

खुदीराम बोस की कविता कोश

खुदीराम के कथा सुनो

भारत माय के व्यथा सुनो

किंग्स फोर्ड अन्यायी के

भारत लाल ऊ चाकी के।

 

खुदीराम बच्चै सें वीर

दुश्मन के छाती में तीर

किंग्सफोर्ड के मारै लें

दुश्मन कै सहारैं लै

 

ऐलै खुदी समस्तीपुर

पर दुश्मन ऊ महिषासुर

बची निकाललै भागों सें

खुदीराम रं आंगों से।

 

खुदी अठारह सालों के

दुश्मन  छेलै कालों के

देशौं लैं फांसी लै लेलकै

वंदे मातरमें बस गैलकै।

 

      

  • अंजली चौहान

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