‘’जनम जनम मोहे बिटिया ही कीजो – बिटिया ही दीजो’’

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gender equality

जिस तरह सुख – दुख, जीत – हार, दिन – रात, यश – अपयश, जीवन – मृत्‍यु सिक्‍के के दो पहलू हैं एवं अटल सत्‍य हैं उसी प्रकार समाज रूपी सिक्‍के के दो पहलू हैं महिला एवं पुरुष । सिक्‍के के इन दो पहलुओं में से किसी एक की भी अवहेलना करना, दम्‍भ में तो सम्‍भव हो सकता है पर यथार्थ में नहीं । हमारे देश में महिलाएं लम्‍बे समय से भेदभाव का यह दर्द झेलती आई हैं ।

हालांकि समय के साथ-साथ काफी परिवर्तन हुआ है परन्‍तु कई राज्‍यों में आज भी पुरुष, या कहें कि परिवार में, लड़कों का महत्‍व सर्वोपरि है । परिवार में लड़के का जन्‍म होने की उत्‍कंठा सिर्फ और सिर्फ इस मानसिकता का द्योतक है कि वंश-बेल पल्‍लवित-पुष्‍पित होती रहेगी । वंश चलाने की चिन्‍ता में डूबे लोगों से मैं यह जानना चाहूँगी कि जिनके घर में कोई पुत्र नहीं है, उन माँ-बाप को, मृत्‍यु के पश्‍चात् क्‍या हानि होती है एवं जिनके घरो में पुत्र हैं, मृत्‍यु के पश्‍चात् उन माँ-बाप को विशेष क्‍या लाभ मिलता  है । कम से कम स्‍वर्ग-नरक की प्राप्‍ति का निर्णय तो इस आधार पर नहीं होता होगा, ईश्‍वर के इस न्‍याय से मैं पूर्णत: आश्‍वस्‍त हूँ ।

मेरा, आज तक का अनुभव तो यही कहता है कि किसी भी परिवार में माता-पिता या किसी भी अन्‍य बुजुर्ग सदस्‍य के आँखे मूंदने भर की देर है – प्रत्‍येक परिवार, जिसमें पुत्र है या जिसमें नहीं है – समान दुख झेलता है, समान मनोदशा से गुजरता है एवं समान रूप से स्‍वयं को असहाय पाता है । इनमें, पुत्र होने या न होने का कोई भिन्‍न प्रभाव नहीं पड़ता । रही बात दाग देने की, तो मैंने कभी ऐसा भी नहीं सुना कि जिनके कोई पुत्र नहीं था, मृत्‍योपरान्‍त उनके अन्‍तिम संस्‍कार या क्रियाकर्म में कोई रूकावट आई हो या किसी भी तरह का कोई व्‍यवधान उत्‍पन्‍न हुआ हो ।

बेटियां बेटों से कम नहीं

बिटिया

आज के इस प्रगतिशील युग में बेटियों ने, बेटों के वर्चस्‍व वाले इस क्षेत्र में भी समान रूप से अपनी उपस्‍थिति दर्ज कराई है । इसके विपरीत अपवाद स्‍वरूप यह जरूर सुनने को मिला है कि माता-पिता से नाराज़ कलयुगी पुत्र ने उनके अन्‍तिम दर्शन से भी इंकार किया है, उनको दाग देने का उत्‍तरदायित्‍व निभाने की बात तो बहुत दूर रही ।

ऐसे में माता-पिता व परिवार के बुजुर्ग किस ‘’वंश’’ को चलाने की चिन्‍ता में भ्रूण हत्‍या के जघन्‍य  अपराध से स्‍वयं को कलंकित करने में लगे हुए हैं – वह वंश, जिससे, अपनी मृत्‍यु के पश्‍चात् उनका कोई सरोकार नहीं रह जाता है । मनुष्‍य, जीवन पर्यन्‍त सिर्फ अपने हित, अपने स्‍वार्थ, अपने सुख की चिन्‍ता में लीन रहता है परन्‍तु सांसों की डोर टूटने के क्षण मात्र से उनको यह तक आभास तक नहीं हो पाता कि उनके निर्जीव शरीर के साथ अब क्‍या होने वाला है । ऐसे में उनको अपने वंश की चिन्‍ता क्‍यों ? कौन ऐसा सौभाग्‍यशाली है जो मृत्‍यु के पश्‍चात् अपने वंश को चलता देख पाया हो ?

सामाजिक प्रथा के अनुसार बेटियाँ सदा से ही ‘’पराया धन’’ के रूप में माँ-बाप के पास रहती हैं अत: उनको विदा करने की मानसिक शक्‍ति ईश्‍वर ने हर माँ-बाप को दी है परन्‍तु बेटा विदा हो तो माँ-बाप का अन्‍तर्मन क्रंदन कर उठाता है । आज के परिवेश में माँ-बाप के लिए सबसे कष्‍टकारी साबित हो रही है बेटों की विदाई । पढ़ाई-लिखाई या नौकरी की खातिर बेटे को विदा करना पड़े, तो भी उसे एक सुकून की विदाई कहा जा सकता है परन्‍तु आज उससे भी कष्‍टकारी वियोग है विवाह के पश्‍चात् बेटों की विदाई ।

आपसी सामंजस्‍य का अभाव, आपसी रिश्‍तों के अपनत्‍व को महसूस कर पाने का अभाव, सिर्फ पति-पत्‍नी एवं बच्‍चों तक सीमित अपने परिवार में रहने की मानसिकता, प्रतिस्‍पर्धा के युग में अपना स्‍टेटस मेन्‍टेन करने की होड़ में संयुक्‍त परिवार से अलग होकर रहने की मानसिकता आदि ऐसे अनेक कारण हैं जिनकी वजह से न चाहते हुए भी माँ-बाप को बेटों की विदाई का दंश झेलना पड़ता है ।

माँ-बाप की, संतान के रूप में पुत्र-रत्‍न प्राप्‍ति की उम्‍मीद, वंश चलता रहे उस आशा से पुत्र प्राप्‍ति की आकांक्षा, युवा काल में जितनी प्रबल रहती है वृद्धावस्‍था में शायद उसी पुत्र-रत्‍न को विदा करते समय उनके आँखों से आंसु भी उतनी ही प्रबलता से प्रवाहित होने को लालायित रहते हैं ।

पुत्र ना होने का दुःख 

वहीं दूसरी ओर, लाडली बेटियों, जिनके जन्‍म पर शायद कभी मिठाइयाँ न बांटी गई हो, बेटे की उम्‍मीद में टकटकी लगाए परिवार वालों को शायद जिस लाडली के जन्‍म ने कुछ हद तक मायूस भी किया हो, जिसे शायद बचपन से ही भाई-बहन ( बेटे-बेटी ) के अंतर को बहुत अच्‍छे से महसूस कराया गया हो, भाई के लिए हर तरह का खर्च वहन कर – दहेज जमा करने का हवाला देकर जिसे शायद छोटी-छोटी खुशियों से वंचित रखा गया हो, वही लाडली बिटिया चुपचाट आँसू बहाती हुई अपने ही घर आंगन, अपने ही माँ-बाप, भाई-बहन से इस कारण विदा ले लेती है कि उसे किसी और का जहाँ रोशन करना है ।

अपने ही घर में इतने भेदभाव सहकर भी जो स्‍वयं को मानसिक रूप से जीवन पर्यन्‍त ‘’मायके’’ से अलग नहीं कर पाती है, जिसका तन ससुराल में और मन सदा पीहर में ही रहता है, आवश्‍यकता पड़ने पर जो, अपने ‘’मायके’’ वालों के लिए, अपने पति – अपने ससुराल पक्ष से भी विद्रोह करने का जज्‍़बा रखती है – उसी लाडली बिटिया के जन्‍म पर चेहरे पर ये मायूसी क्‍यों, उसके जन्‍म से पहले ही उसकी हत्‍या का क्रूर षडयन्‍त्र क्‍यों, उसके अधिकारों का हनन क्‍यों, अपने ही घर में वह भेदभाव का शिकार क्‍यो ?

समय के साथ-साथ समाज में आमूल-चूल परिवर्तन हुए हैं, काफी हद तक इस परिप्रेक्ष्‍य में लोगों की विचारधारा बदली भी है पर आज भी समाज का एक बड़ा हिस्‍सा ‘’एक बेटा हो जाए‘’ की मानसिकता में जकड़ा हुआ जी रहा है । युग परिवर्तन और आज के बदले हुए माहौल में आवश्‍यकता है उन्‍हें यह समझने की कि –

‘’जो करें वंश की चिन्‍ता, वो पाएं मानसिक दंश ।

बांहों में भर लो बिटिया को, वह भी है तुम्‍हारा अंश ।।‘’

 

श्रावणी गांगुली

 

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